पाकिस्तान-चीन की ‘सीक्रेट डील’ का पर्दाफाश, अमेरिकी रिपोर्ट से मचा हड़कंप
वॉशिंगटन: अमेरिका के एक स्वतंत्र समाचार आउटलेट 'ड्रॉप साइट न्यूज़' ने पाकिस्तान के बेहद गोपनीय सैन्य दस्तावेजों की समीक्षा के आधार पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपनी सैन्य जरूरतों के लिए चीन के सामने बेहद कड़ा मोलभाव कर रहा है। पाकिस्तान ने चीन को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ग्वादर पोर्ट को एक स्थायी सैन्य अड्डे के रूप में इस्तेमाल करने की हरी झंडी दी है, लेकिन इसके बदले में वह बीजिंग से ऐसी परमाणु पनडुब्बियों की मांग कर रहा है जो 'सेकेंड स्ट्राइक' की क्षमता से लैस हों। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि कोई दुश्मन देश पहले हमला करके पाकिस्तान के जमीनी और हवाई परमाणु ठिकानों को नष्ट भी कर दे, तब भी समुद्र की गहराइयों में छिपी ये पनडुब्बियां दुश्मन पर भारी जवाबी परमाणु हमला करने में सक्षम रहें।
जनरल आसिम मुनीर की अगुआई में हुआ था गुप्त मोलभाव
इस सनसनीखेज सौदे की कड़ियां साल 2024 में पाकिस्तानी सेना और चीन के बीच हुई एक उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बातचीत से जुड़ती हैं। उस समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल आसिम मुनीर इस गुप्त वार्ता का नेतृत्व कर रहे थे। साल 2024 की शुरुआत में पाकिस्तान ने बीजिंग को निजी तौर पर आश्वस्त किया था कि वह ग्वादर को चीनी सेना के स्थायी बेस के रूप में विकसित करने देगा, जिसके बाद उसने चीन से परमाणु-सक्षम पनडुब्बियों की मांग सामने रख दी। पाकिस्तान का मकसद इसके जरिए 'न्यूक्लियर ट्रायड' यानी जल, थल और नभ तीनों जगहों से परमाणु हमला करने की सर्वोच्च ताकत हासिल करना था। हालांकि, चीन ने पाकिस्तान की इस मांग को बहुत ज्यादा और अनुचित माना, जिसके कारण यह बातचीत वहीं रुक गई।
अमेरिका और चीन के बीच पाकिस्तान का दोहरा खेल
'ड्रॉप साइट न्यूज़' की हालिया रिपोर्ट पाकिस्तान की एक ऐसी तस्वीर पेश करती है, जो अपने दो सबसे बड़े रणनीतिक साझेदारों—चीन और अमेरिका—के साथ एक ही समय पर दोहरा खेल खेल रहा है। एक तरफ जहां पाकिस्तान खुद को अमेरिका के करीब लाने और वॉशिंगटन के साथ अपने दशकों पुराने अविश्वास को दूर करने में लगा है, वहीं दूसरी तरफ वह चीन से घातक और रणनीतिक हथियार ऐंठने के लिए ग्वादर का सौदा करने से भी पीछे नहीं हट रहा है। पाकिस्तान के इस रवैये ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की रफ्तार को भी धीमा किया है, जिससे चीन नाराज है, जबकि अमेरिकी प्रशासन के साथ इस्लामाबाद की नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं।
चीनी 'माल' के भरोसे समुद्र में ताकत बढ़ाने की नाकाम कोशिश
पाकिस्तान का परमाणु इतिहास गवाह है कि उसने हमेशा चीन की बैसाखियों का इस्तेमाल किया है। 1970 और 1980 के दशक में चीन ने ही पाकिस्तान को परमाणु बम के ब्लूप्रिंट और एनरिच्ड यूरेनियम मुहैया कराया था, जिसके बाद 1990 के दशक में चीन से मिली एम-11 मिसाइलों के दम पर पाकिस्तान ने हवा और जमीन से परमाणु हमले की क्षमता पाई थी। लेकिन समुद्र के नीचे से परमाणु मिसाइल दागने की तकनीक बेहद जटिल और महंगी होने के कारण यह हमेशा से इस्लामाबाद की पहुंच से बाहर रही है। वर्तमान में दुनिया के केवल छह देशों—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और भारत—के पास ही यह अचूक क्षमता मौजूद है।
हैंगोर क्लास पनडुब्बी सौदा और अधूरी हसरत
भारत के सुरक्षा विशेषज्ञों का लंबे समय से यह अनुमान था कि पाकिस्तान की अब तक की सबसे बड़ी 5 अरब डॉलर की 'हैंगोर क्लास' पनडुब्बी डील उसे समुद्र से परमाणु हमला करने की ताकत दे देगी। इस सौदे के तहत आठ पनडुब्बियों में से पहली 'पीएनएस हैंगोर' को चीन के सान्या में सर्विस में शामिल भी किया जा चुका है। भारतीय विश्लेषकों का मानना था कि इनमें से दो पनडुब्बियां 'S-30' क्लास की होंगी जो पानी के भीतर 30 दिनों तक रहकर 1,500 किलोमीटर दूर तक परमाणु क्रूज मिसाइल दाग सकेंगी। लेकिन 'ड्रॉप साइट न्यूज़' के नए खुलासे से यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान का यह तीन-चरणों वाला परमाणु सौदा फिलहाल खटाई में पड़ गया है क्योंकि चीन उसकी ग्वादर के बदले परमाणु पनडुब्बी की बड़ी मांग को पूरा करने के मूड में नहीं है।
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