इबोला संक्रमण ने बढ़ाई टेंशन, क्या फिर जरूरी होगा मास्क पहनना?
अफ्रीकी देशों (कांगो और युगांडा) से शुरू हुआ इबोला वायरस का प्रकोप अब पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे 'अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' घोषित किए जाने के बाद वैश्विक स्तर पर सतर्कता बढ़ा दी गई है। इस बढ़ते खतरे का सीधा असर भारत पर भी देखने को मिला है, जहाँ ऐहतियात के तौर पर 28-31 मई तक देश की राजधानी में होने वाले 'भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलन' को आगे के लिए टाल दिया गया है। कांगो में इस वायरस का एक दुर्लभ स्ट्रेन तेजी से पैर पसार रहा है, जिसके चलते अब तक करीब 600 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं और 139 लोगों की जान जा चुकी है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर इसका जोखिम फिलहाल कम है।
क्या फिर से कोरोना जैसा लॉकडाउन और मास्क का दौर लौटेगा?
इबोला के बढ़ते मामलों को देखकर लोगों के मन में यह डर सताने लगा है कि क्या एक बार फिर कोरोना जैसी पाबंदियों और मास्क के दौर से गुजरना होगा? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस पर स्थिति साफ करते हुए कहा है कि देश में अभी तक इबोला संक्रमण का एक भी मामला सामने नहीं आया है। जहाँ तक मास्क लगाने का सवाल है, तो चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इबोला से बचने के लिए मास्क पहनना जरूरी नहीं है। यह कोरोना की तरह हवा के जरिए फैलने वाली सांस की बीमारी नहीं है, इसलिए मास्क लगाकर इसके संक्रमण को नहीं रोका जा सकता।
संक्रमण की वजह और क्यों बेहद जानलेवा है यह वायरस?
चिकित्सकों के अनुसार, इबोला वायरस हवा से नहीं बल्कि संक्रमित मरीज के शारीरिक तरल पदार्थों (जैसे खून, पसीना, लार, उल्टी या अन्य द्रवों) के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। यही वजह है कि संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाकर ही इससे सुरक्षित रहा जा सकता है। इबोला को दुनिया के सबसे घातक रोगों में इसलिए गिना जाता है क्योंकि इसकी मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है। गंभीर स्थिति में मरीज के शरीर के आंतरिक अंगों से खून बहने लगता है और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण मौत हो जाती है। चिंता की बात यह भी है कि इस समय फैल रहे 'बुंडिबुग्यो स्ट्रेन' के इलाज के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत टीका या पुख्ता दवा उपलब्ध नहीं है, जिससे इसका खतरा और ज्यादा गंभीर हो जाता है।
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