‘फ्री एंड फेयर चुनाव से सीधा संबंध’, SC ने SIR को सही ठहराया
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने चुनाव आयोग (Election Commission) की इस प्रक्रिया को पूरी तरह वैध मानते हुए क्लीन चिट दे दी है। न्यायालय ने साफ किया है कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराने के लिए मतदाता सूची को दुरुस्त करना चुनाव आयोग के संवैधानिक दायरे में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) का फैसला पूरी तरह से वैध है और चुनाव आयोग को इसका पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त है। अदालत के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
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कानूनी रूप से सही: यह प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) और 1960 के नियमों के पूरी तरह अनुकूल है।
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त्रुटियों के आधार पर खारिज नहीं: सिर्फ इसलिए कि यह प्रक्रिया कुछ जगहों पर तय तौर-तरीकों का कड़ाई से पालन नहीं कर पाई, इसे अवैध या अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
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भेदभावपूर्ण नहीं: यह प्रक्रिया जरूरत से ज्यादा सख्त या मनमानी (Manifestly Excessive) नहीं थी। इसमें मतदाताओं को पर्याप्त सुरक्षा उपाय और अवसर दिए गए।
नागरिकता की जांच और नाम हटाने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकारों को स्पष्ट करते हुए दो महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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वोटर लिस्ट के लिए जांच का अधिकार: चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने के सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर सकता है। अगर कोई नागरिक जरूरी कागजात पेश नहीं कर पाता है, तो कानून के तहत उसका नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है।
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अंतिम फैसला सरकार का: हालांकि, चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट से नाम हटाया जाना किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा। यदि किसी नागरिक का नाम विदेशी होने के संदेह में हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग ऐसे मामलों को आगे की जांच और अंतिम फैसले के लिए केंद्र सरकार के पास भेज सकता है।
आधार कार्ड को लेकर कोर्ट का पिछला निर्देश
इस मामले की सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं के हितों की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम उठाया था। न्यायालय ने निर्देश दिया था कि 'आधार कार्ड' को वोटर लिस्ट में पहचान या पते के प्रमाण के रूप में पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की सूची में शामिल किया जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड अकेले नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं होगा, और चुनाव आयोग के अधिकारियों को दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचने का पूरा अधिकार होगा।
क्या था पूरा विवाद?
विपक्ष के कई बड़े नेताओं (जिनमें महुआ मोइत्रा, मनोज झा और केसी वेणुगोपाल शामिल थे) ने चुनाव आयोग की इस 'एसआईआर' (SIR) प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी थी। विपक्ष का आरोप था कि इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे चुनावों के नतीजों पर असर पड़ सकता है। यह प्रक्रिया बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पहले ही पूरी हो चुकी थी, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया चल रही है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम फैसले के बाद अब देश भर में इस अभियान को जारी रखने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
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