भोपाल गैस त्रासदी मामला: खराब मौसम बना सुनवाई में बाधा
भोपाल गैस त्रासदी मामले की सुनवाई शुक्रवार को पूरी नहीं हो सकी. दिल्ली में घने कोहरे के कारण सीबीआई अधिकारियों की फ्लाइट लेट हो गई, जिससे वे दोपहर 12:30 बजे कोर्ट पहुंच पाए. वहीं डॉव केमिकल की ओर से पेश वकीलों ने इसके बाद इंतजार करने से इनकार कर दिया. डॉव के वकीलों का कहना था कि उन्हें दोपहर 2 बजे की फ्लाइट से दिल्ली लौटना है, इसलिए वे 12:30 बजे के बाद सुनवाई में शामिल नहीं हो सकते.इस पर अदालत ने स्थिति को संज्ञान में लेते हुए डॉव के वकीलों को 26 फरवरी को अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के मुद्दे पर बहस समाप्त करने के लिए अंतिम अवसर दे दिया. अब अगली सुनवाई में डॉव के वकीलों को अधिकार क्षेत्र पर अपनी दलीलें पूरी करनी होंगी, जिसके बाद कोर्ट इस ऐतिहासिक मामले में आगे की प्रक्रिया तय करेगा.
भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की हुई थी मौत
भोपाल गैस त्रासदी मे अब तक हुई घटनाएं
2–3 दिसंबर 1984
यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (UCIL) के भोपाल स्थित कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस रिसाव हुआ. इसमें हजारों लोगों की मौत हुई और लाखों लोग प्रभावित हुए.
साल 1984–85
भारत सरकार ने आपदा को राष्ट्रीय त्रासदी घोषित किया. यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (UCC) के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई.
साल 1989
भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच 470 मिलियन डॉलर (करीब 715 करोड़ रुपये) का समझौता किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने समझौते को मंजूरी दी है.
साल 1991
सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों को बहाल किया है. तत्कालीन चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित किया गया.
साल 2001
यूनियन कार्बाइड का डॉव केमिकल में विलय किया गया. पीड़ित संगठनों ने डॉव को भी जिम्मेदार ठहराने की मांग की.
साल 2010
भोपाल की निचली अदालत ने आठ आरोपियों को दोषी ठहराया. दो साल की सजा और जुर्माना के फैसले पर देशभर में विरोध किया गया.
साल 2012–2014
मुआवजा बढ़ाने और पुनर्वास की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दी गईं.
2015 से अब तक की वर्तमान स्थिति
2015 के बाद गैस पीड़ितों ने डॉव के खिलाफ आपराधिक और सिविल जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज कर दी . वहीं वर्तमान स्थिति की बात करें तो अदालत में डॉव के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) को लेकर सुनवाई जारी है. कोर्ट ने डॉव के वकीलों को 26 फरवरी तक बहस पूरी करने की अंतिम अनुमति दी है.

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